बेंगलुरु में सॉफ्टवेयर इंजीनियर अतुल सुभाष ने पारिवारिक विवाद और दहेज उत्पीड़न के केस से परेशान होकर आत्महत्या कर ली. 24 पन्नों के सुसाइड नोट और वीडियो में उन्होंने अपनी पीड़ा व्यक्त की. इस घटना की वजह से अतुल के समस्तीपुर स्थित घर में मातम पसर गया.
अगर आपको कुछ करना है, तो खुद के संसाधन जरूरी नहीं। यह साबित किया है धार जिले के मनावर के किसान ने। अपनी मेहनत और लगन से किराए की जमीन पर न सिर्फ फसल उगाई, बल्कि मोटा मुनाफा भी कमा रहे हैं। ये हैं पवन कुशवाह। पेशे से निजी कंपनी में मैनेजर। दैनिक भास्कर की स्मार्ट किसान सीरीज में इस बार मूलत: बाकानेर गांव के रहने वाले पवन कुशवाह (48) से मिलवाते हैं। बीकॉम तक पढ़ाई की है। उन्होंने बताया कि कैसे दो बीघा जमीन पर अंबाड़ी भाजी की खेती शुरू की। इसकी मदद से सालाना करीब तीन लाख रुपए से ज्यादा का प्रॉफिट कमा रहे हैं। यही नहीं, अन्य किसानों को भी विलुप्त हो रही इस फसल को उगाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। किसानों को प्रोत्साहित करने और उत्पादन बढ़ाने के लिए इसके बीज निशुल्क उपलब्ध कराते हैं। पुरानी परंपरा को कायम रखने के लिए उगाई फसलकिसान पवन कुशवाह बताते हैं, पिछले कई साल से किसानों के साथ जैविक और टिकाऊ खेती के प्रोजेक्ट पर काम कर रहा हूं। खेती के साथ अंबाड़ी भाजी खाने का शौक है। मार्केट में यह आसानी से मिलती नहीं है। यूं कहें कि यह विलुप्त होती जा रही है। कई बार खेती करने के बारे में सोचा, लेकिन खुद की जमीन नहीं होने से पीछे हट जाता था। इसके बाद आइडिया आया कि किराए से भी जमीन ली जा सकती है। जहां काम करता हूं, उनके पास दो बीघा जमीन है। करीब तीन साल पहले मालिक से बात की, तो वह तैयार हो गए। सालभर के करीब 10 हजार रुपए उन्हें किराए के रूप में दे देता हूं। उन्हें भी सब्जी मिल जाती है। नाइजीरिया से ऑनलाइन अंबाड़ी भाजी के बीज मंगवाए। कारण- यहां के बीज की क्वालिटी ज्यादा अच्छी होती है। इससे उत्पादन भी ज्यादा होता है। जैविक तरीके से अंबाड़ी भाजी की खेती शुरू कर दी। बाद में हल्दी और सौंफ का भी उत्पादन करने लगे। तीन से चार लोग काम पर रखे। शुरुआती साल में अंबाड़ी की भाजी तैयार कर स्थानीय स्तर पर बेची। निमाड़ क्षेत्र में कुछ विशिष्ट (विवाहोत्सव में मंडप के दिन, दिवाली की पड़वा तिथि) पर अनिवार्य रूप से अंबाड़ी भाजी बनाकर परंपरा निभाया जा रहा है। ऐसे शौकीन लोगों तक भाजी पहुंचाने और परंपरा कायम रखने के लिए इसकी फसल उत्पादन करने का फैसला लिया है।’ गोमूत्र के छिड़काव से कीटों से बचावपवन के मुताबिक अंबाड़ी की बुवाई सामान्यतः बारिश के मौसम में की जाती है। प्रति बीघा 750 ग्राम बीजों की आवश्यकता होती है। दो पौधों की बीच की दूरी करीब एक फीट रखनी होती है, जबकि दूसरी कतार की दूरी करीब दो से ढाई फीट रखनी होती है, जिससे पौधे को फैलने के लिए जगह मिले। बीज की कीमत 200-300/-किलो होती है। जैविक पद्धति से उत्पादन करने पर एक बार गोबर खाद दिया जाता है। कीट नियंत्रण के लिए गोमूत्र का छिड़काव किया जाता है। इसकी खेती करने में खास तैयारियों की जरूरत नहीं पड़ती है। 800-1200 रुपए प्रति किलो बिकती है पवन बताते हैं, ‘सामान्य तरीके से निराई-गुड़ाई के बाद अक्टूबर महीने में इसके फूल आना शुरू हो जाते हैं। फूल खिलने के बाद इसके पत्ते तोड़े जाते हैं। 20 किलो हरी पत्ती को पारंपरिक तरीके से भाजी बनाकर सुखाने पर दो से तीन किलो सूखी भाजी मिलती है। बाजार में इसकी कीमत 800-1200 रुपए किलो तक मिलती है। वहीं, एक बीघा से तकरीबन 1 से 1.5 क्विंटल सूखी भाजी मिलती है। सूखी भाजी बनाने में बड़ा खर्च मजदूरों का रहता है, क्योंकि भाजी बनाने में पारंपरिक तरीके का पालन करना पड़ता है। औसतन मजदूर का खर्च 30 हजार रुपए आता है।’ सोशल मीडिया पोस्ट से मिली पहचानपवन बताते हैं कि पिछले साल यानी 2023 में 50 किलो अंबाड़ी की भाजी तैयार करके रखी थी। इसे बेचने के लिए कई लोगों से संपर्क करना था। मैं सोशल मीडिया पर इंदौर के सोशल ग्रुप ‘इंदौर वाले’ पर जुड़ा था। एक दिन बैठे–बैठे अंबाड़ी की भाजी की पोस्ट शेयर कर दी। दो-तीन दिन में 100 से अधिक लोगों ने बुकिंग कर ली। महज एक हफ्ते में स्टॉक खत्म हो गया। कई ग्राहकों को समय पर उपलब्ध भी कर नहीं पाए। इस पोस्ट के माध्यम से स्थानीय ग्राहकों के अलावा इंदौर, खंडवा, धार, खरगोन, बड़वानी, झाबुआ से लेकर राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तराखंड और गुजरात के कस्टमर भी जुड़ गए। वहीं, कुछ कस्टमर्स ऐसे हैं, जिन्होंने विदेश में बसे अपने रिश्तेदारों और परिचितों के लिए विशेष रूप से मांग की। देखने में केसर की तरह लगती है पवन कुशवाह बताते हैं, सर्दियों की शुरुआत होते ही अंबाड़ी के पत्ते तोड़कर पहले दिन छांव में सुखाए जाते हैं। दूसरे दिन पत्ते नरम होने के बाद लकड़ी की मोगरी से कूटा जाता है। फिर इन पत्तियों को लाल पत्थर की फर्सी पर रोला जाता है। इनको तब तक रोला जाता है, जब तक कि रस पत्ती को तरबतर न कर दे। इसके बाद इनकी लटें बनाकर अलग-अलग किया जाता है। कुछ घंटे छांव में सुखाने के बाद एक बार फिर इन लटों को हाथों से रोला जाता है। तीसरे दिन इन लटों को धूप में सुखाया जाता है। फिर इसे आधा किलो और एक किलो के बॉक्स में पैक कर ग्राहकों को कुरियर के जरिए भेजा जाता है। एक किलो की पैकिंग और डिस्पैचिंग का खर्च 200 रुपए आता है। यह केसर की तरह दिखती है। ऐसी होती है अंबाड़ी की भाजीअंबाड़ी मूलतः अफ्रीका की मूल प्रजाति कही जाती है। वहां की वैरायटी के फूल इन दोनों भारतीय प्रजाति से भिन्न गहरे महरून रंग के होते हैं। इनमें ज्यादा खटास होती है। पवन ने अपने मित्र के माध्यम से नाइजीरिया से लाल अंबाड़ी का बीज बुलवाकर उत्पादन किया है, जो जैविक तरीके से किया जाता है। महाराष्ट्र, तमिलनाडु और कर्नाटक में होती है खेतीअंबाड़ी की खेती देश के अलग-अलग हिस्सों में की जाती है। मराठी में अंबाड़ी, तेलुगु में गोनगुरा, मलयालम में इसे कंजूर कहा जाता है। अंबाड़ी की भारत में दो तरह की प्रजाति है- हरी और लाल अंबाड़ी। लाल अंबाड़ी में हरी अंबाड़ी की तुलना में ज्यादा खट्टापन होता है। ये भी पढ़ें... टमाटर, लहसुन और अरहर की खेती ने बनाया लखपति: छिंदवाड़ा से नागपुर तक बिकने जा रही हरी अरहर; दाम 70 रुपए प्रतिकिलो छिंदवाड़ा के झामटा के एक किसान ने पारंपारिक खेती को छोड़कर टमाटर, लहसुन, आलू के साथ ही अरहर की खेती करना शुरू की है। इससे वह सालाना लाखों रुपए की इनकम कर रहे हैं। पारंपारिक खेती के छोड़ने से उनकी आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो गई है। किसान का नाम शरद नागरे है। दैनिक भास्कर की स्मार्ट किसान सीरीज में शरद नागरे के बारे में जानेंगे और कैसे ये किसान हरी तुअर (अरहर) की खेती करते हैं। पूरी खबर पढ़ें... मशीन से रोपी धान, ड्रोन से छिंड़कते हैं दवा: बालाघाट के किसान 130 एकड़ में कर रहे टेक्नो फ्रेंडली खेती; देखने जापानी इंजीनियर भी आए खेती में टेक्नोलॉजी की मदद से किस तरह लागत कम कर प्रॉफिट बढ़ाया जा सकता है, इसे साबित किया है बालाघाट के विशाल कटरे ने। टेक्नो फ्रेंडली युवा किसान विशाल 130 एकड़ जमीन में धान की खेती कर रहे हैं। जुताई से लेकर कटाई तक मशीनों की मदद से करते हैं। इससे प्रॉफिट 60 फीसदी तक बढ़ गया। उनके खेती के तरीके को देखने के लिए जापान के इंजीनियर भी आ चुके हैं। पढ़ें पूरी खबर...
US Green Card: अमेरिका में ग्रीन कार्ड हासिल करना किसी ऊंचाई वाले पहाड़ को चढ़ने जैसा है। भारतीयों के लिए तो ग्रीन कार्ड हासिल करना और भी ज्यादा मुश्किल है, क्योंकि इसके लिए वेटिंग टाइम बहुत ज्यादा होता है। ग्रीन कार्ड से जुड़ी जानकारी हर महीने अमेरिकी सरकार की तरफ से वीजा बुलेटिन के तौर पर जारी की जाती है।
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